पुष्प का जीवन

पुष्प के पौधें में हुई लालसा 
कुछ प्रजनन करने की अभिलाषा।
भौंरे तितलियां जब मंडराने लगी 
जागृत हुआ काम की क्षुधा।।

गोधूली में बनी वह कोपल 
रात्रि ने उसमें प्राण फूंके।
चांद सितारे मंडराए उसपर 
बंद कली से बनी किशोरी।।

निशांत की बेला आते आते 
इसके रूप का निखार हुआ।
ज्यूँ सूरज ने देखा उसको 
मंद मंद वह कुछ मुसकाई।।

दिन शनै शनै ढलता गया 
फूल बन वह मुरझाई।।

Created on 20/9/2025
All rights reserved 
@ Ramesh Rai 

Popular posts from this blog

Web Of Wisdom

नीलाम

THE HYMN OF MERCY