यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ 4.7॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ 4.8 ॥ Whenever there is a loss of religion, O Bhārata, When irreligion arises, I create Myself. 4.7॥ It is for the salvation of the pious and the destruction of the wicked. I appear in every age to establish religious principles. 4.8 ॥ These are the the immortal words of Lord Krishna To balance the nature It reveals itself in different forms Performs the addiulant Survives in original nature Because the whole is immortal Thy expresses in bhakti yoga Or the realisation of Dharm yoddha
Posts
प्रकृति का मेलजोल।
- Get link
- X
- Other Apps
प्रकृति का मेलजोल बड़ा ही अदभुत है असंख्य जीव पल रहे प्रकृति के गोद में।। असंख्य जीवों का आहार प्रकृति खुद देती है ए हवाएं ए किरणे प्रकृति के प्रतिपालक है।। प्रकृति के सूक्ष्म तत्व जिसकी पहचान है बाकी मानव भी खोया है आडंबरों से घिरा है।। प्रकृति अपने रंग में रंगती है सभी को।। Created on 22/9/2025 All rights reserved @ Ramesh Rai
समुद्र की लहरें।
- Get link
- X
- Other Apps
समुद्र की लहरें उठती हैं गिरती हैं प्रचण्ड वेदना को सह कर भी वह कभी नहीं थकती और ठहरती है समुद्र की लहरें प्रतिपल जीती है।। जहां जीवन है संचार है हर पल जहां संचार है ऊर्जा है हर पल ऊर्जामान आगे बढ़ता है सदा कितनी ऊर्जा समेटे हुए है बक्ष में ।। समुद्र की लहरें दे देती है सदा कुछ भी नहीं रखती है अपने लिए समुद्र के उदर में पल रहे जीव अपने अस्तित्व की रक्षा करती है सदा।। यह तो बस समुद्र की लहरें है जिसकी गर्जना से जीवन जागृत होता है।। Created on 21/9/2025 All rights reserved ,@ Ramesh Rai
कविता के झरोखे से।
- Get link
- X
- Other Apps
जब सारी दुनिया सोती है तुम तारे गिना करते हो समय के प्रति पल में अपनी विचारों को बिखेरा करते हो।। ऐसा नहीं की तुम्हारे विचार मन मस्तिष्क में टकरा कर रह जाते हैं बल्कि यह विचार समय के प्रवाह में बह जाते हैं और फिर तुम कहते हो कि ऐसा ही मैंने सोचा था।। तुम्हारी अनुप्रेरणा सृष्टि की धूरी बन जाती है क्योंकि रात भर जगकर तुम यही सोचा करते थे।। आज काया बदली जीवन की समय ने करवट बदल लिया तुम्हारी कल्पना कविता बन नव जीवन श्रृंगार किया। क्या तुमने कभी ऐसा सोचा था ऐसा भी एक दिन आएगा तुम्हारी एक एक कल्पना श्रृंगार करेगी युग के आभूषण से भर देगी खुशियां प्रकृति के हर कण कण में।। ऐ मेरे प्रिय कवि कविता लिखना ही एक कर्म नहीं शुद्ध चेतना के झरोखे से अपने आप को बिखेरना यह भी बड़ा कर्म है।। Created on 28/3/2026 All rights reserved @ Ramesh Rai
सिसकता भारत
- Get link
- X
- Other Apps
सिसकता भारत है पहचान हमारी सिसकता भारत है अरमान हमारी कभी औरों के लिए सिसकते हैं कभी खुद के लिए सिसकते हैं। बुद्ध ने रोया औरों की पीड़ा से जग ने रोया अपनी पीड़ा से कोई रोया दूसरे के सुख से हम ने रोया जग की पीड़ा से। अच्छा है पेड़ पौधें नहीं रोते नहीं रोते नभचर जलचर नहीं रोते तारे अनगिनत नहीं रोते पर्वत सरोवर।। बस एक ही जीव है जिसे हंसना भी आता है। Created on 21/9/2025 All rights reserved @ Ramesh Rai
जब सो गई चांदनी।
- Get link
- X
- Other Apps
जब सो गई चांदनी बिखर गया चंद्रमा बिखर गए तारे सभी नभ बना तारों रहित। चंद्रमा की चांदनी आज क्यूं सो गई विभावरी भी आज शून्य में खो गई। है कहां वह चांदनी है कहां वह विभावरी है कहां नभ का प्रियतमा है कहां रजनी प्रभा। विलीन हो गए सभी विलीन हो गया आसमा । Created on 21/9/2025 All rights reserved @ Ramesh Rai
जीवन के सरोवर में
- Get link
- X
- Other Apps
जीवन के सरोवर में पाया एक मोती अति प्रकाशवान है यह मोती जिसका न कोई उपमा है यह दिव्य कांति से भरा हुआ अति मनमोहक है यह मोती। धवल कांति से भरा हुआ असंख्य तारों से जुड़ा हुआ यह पावन अति उत्तम है यह शुद्ध चेतना से निर्मित है प्रचण्ड सुरभि से नियंत्रित है यह मोती है कल्पित। Created on 21 9 2025 All rights reserved Ramesh Rai