जब दुल्हन जाती पी के घर।

जब दुल्हन जाती पी के घर 
कौन सी रीत निभाती है।
कितनी खुशियां कितना वैभव 
संजोए नया घर बसाती है ।।

नये जीवन का उड़ान भरकर 
खुले आसमान में मंडराती है।
अपनी खुशबू से हवाओं में 
अविरल प्रेम सुधा बरसाती है।।

जब नई नवेली दुल्हन बनकर 
एक चौखट से दूसरे चौखट तक।
मापती है अपने पैरों से 
छू लेती है अवनी और अम्बर।।

विष्णु ने मापा था 
स्वर्ग धरा पाताल लोक।
लेकिन न कठिन था फिर भी 
अल्प दूरी को तय कर पाना।।

कितना कठिन है आज 
इस पार से उस पार तक जाना।
अवनि से अम्बर तक 
दूरी तय कर पाना।।

एक चौखट बनी जन्मस्थली 
तो दूसरा बनी मृत्युस्थली।
जीवन मरण का यायावर 
कितना सुन्दर कितना निर्मल।।

Created on 19/9/2025
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@ Ramesh Rai 





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