जीने की तमन्ना
स्निग्ध आत्मा देख रही
जीवन का अभिनव पल ।
मन्द मन्द मुस्कानों से
पुष्पित होता अविरल पल ।।
हर पल हर क्षण
झांक रही चहुं दिशाएं ।
सरल कांति ऊर्जा लेकर
प्रस्फुटित होता हर कमलदल ।।
नव तारों से नव भंगों से
निष्पादित होता जीवन पल ।
आभाओ से जुड़ी हुई है
जीवन का हर क्षण हर पल ।।
कहीं कोई चाह नहीं है
कहीं कोई राह नहीं है ।
फिर क्यों है जीवन कलुषित
जीने की परवाह नहीं है ।।
Created on 28 June 2025
All rights reserved
@ Ramesh Rai