विश्व कल्याण

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्" सभी सुखी रहें, स्वस्थ रहें, सब का भला हो। 
अप्पो दीपो भव" भगवान बुद्ध का एक प्रसिद्ध उपदेश है, जिसका अर्थ है "अपने दीपक स्वयं बनो" या "अपना प्रकाश स्वयं बनो"। यह वाक्य आत्म-निर्भरता और आत्म-ज्ञान का प्रतीक है, जो व्यक्ति को यह सिखाता है कि उसे अपने भीतर से ही सत्य और ज्ञान प्राप्त करना चाहिए और बाहरी गुरु या सहारे पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। 
अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च” महाभारत के इस श्लोक के आधार पर रचा गया है- अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः । अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते ॥ इसका अर्थ है – अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम तपस्या (तप) है। अहिंसा परम सत्य है और इससे धर्म की प्रवृत्ति आगे बढ़ती है।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" का अर्थ है कि माँ और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं. यह एक संस्कृत सूक्ति है जो बताती है कि जिस माँ ने जन्म दिया है और जिस धरती पर जन्म लिया है, वह स्थान किसी भी स्वर्ग से कहीं अधिक श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण है. यह वाक्यांश भगवान श्रीराम द्वारा दिया गया है, जब उन्हें लक्ष्मण से कहा गया था कि वह सोने की लंका में रुक जाएं, तब उन्होंने कहा था कि उन्हें सोने की लंका में कोई रुचि नहीं है क्योंकि उनकी माँ और मातृभूमि उनके लिए स्वर्ग से भी ऊपर हैं. 
यही है भारत की संस्कृति। दुनिया में भारत ही एक मात्र देश है जिसका एक नही अनेक नाम है। इसके संस्कृति में ऐसी विशालता है जो पूरे विश्व को अपने हृदय में स्थान दे सकता है। वो धन्य हैं जिन्होंने इस धरती पर जन्म लिया। इस तरह अनेकों श्लोक तथा उदाहरण है जो विश्व ही नहीं बल्कि पूरे सृष्टि एवं जीव जगत के कल्याण का संदेश देता है।

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