यादें

टीन ऐज में लिखी गई मेरी एक कविता का एक अंश

हुंकार भरो मशाल जलाकर 
फैला दो एक तीक्ष्ण रौशनी 
अपने रक्त को स्याही बनाकर 
निर्माण करो एक नई लेखनी ।

1985अप्रैल संभवत 27 या 28 मैंने एक कविता रची थी अपनी नई नवेली दुल्हन के लिए 

उषाकालीन में 
मधुमास में 
सूर्य की लालिमा में 
बंद पंखुड़ियों से 
भौंरे निकलते हैं 
ब्यारों  का स्पर्श 
भौंरे ही जानते होंगे।

इसके बाद की बहुत सी पंक्तियां मेरे स्मृति पटल पर नहीं है और वह कागज भी नही है इसके बाद की दो पंक्तियां आज भी याद है ।

प्रगाड़ के शुष्म जल में 
मत्स्यों की मैथुन क्रीड़ा 
यह तुम्हारी ही स्मिता है।

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