कविता मेरी प्रेयसी

कविता 
मैं तुम्हे भुला नहीं पाया 
आज भी तुम मुझे याद आती हो 
जीवन के हर पल में 
सुख में, दुख में 
हर क्षण मै तुम्हे याद करता हूं 
मेरा तुम्हारा प्रेम 
बचपन का प्रेम है 
बचपन का प्रेम कभी भूला जा सकता है।

नहीं , कभी नहीं!
इतने दिनों से जुदा होकर 
फिर तुम्हारे पास आया हूं मैं।

स्वीकार करो या न करो 
लेकिन तुम हो मेरी साया 
याद करो वो बीते दिन 
जब सुना था ये गीत 
तुम्हारी ही मृदुल होठों से 
मैं कही कवि न बन जाऊं 
तेरे प्यार में ऐ कविता 

फिर मै तुमसे दूर गया 
दे न सका तुम्हे उतना प्यार 
फिर मैं भी बन जाता 
एक और कवि गुलजार 
वादा करता हूं 
अब नहीं छोडूंगा 
तुम्हारा दामन 

तुम मुझसे दूर रह कर भी 
बस चुकी हो लोम लोम में 
हर सांसों में बस तुम ही तुम हो 
रूप नया सज धज आती हो 

याद करो वो दिन 
जब मैं कहा करता था 
मेरी कविता बिकाऊ नहीं है 
मैने निभाया अपना वादा 
दूर रहकर भी सदा साथ रहा 

धर्मपत्नी ने कहा था 
कविता नही दे सकती है रोटी 
लेकिन यह क्या देख रहा हूं 
तुम तो दे सकती हो सबको रोटी 

खैर छोड़ो इन बीते बातों को 
सज धज कर श्रृंगार करो 
मै देखता रहूं तुमको 
जीवन के हर पल पल को

कभी तुम मेरे जीवन में 
एक प्रवाह ऐसा लाना 
समुद्र की लहरों को भी 
अपने वक्ष में छुपा लाना 

ऐ मेरी कविता 
मेरे जीवन में हर पल आना 

फूलों की खुशबू बनकर 
वायुमंडल में छा जाना 
कभी इन्द्र धनुष बनकर 
सप्त रंगों से सजाना 
प्यासे का प्यास बुझाना 
भूखों को तृप्त कर जाना 
दीन दुखी पर दया दिखाना 
सबके मन को हर्षाना 
बच्चों की तुतली आवाज में 
मम्मा मम्मा कह चिल्लाना 
कभी उनके मुस्कान बनकर 
सबको मोहित करते जाना 

मै श्रृंगार करूंगा तुमको 
नई नवेली दुल्हन जैसी हो 
तरूणाई की गीत रचूंगा 
भौंरे भी मंडराएगे तुमको 
तुम प्रेयसी मैं प्रेमी हूं 
दोनो मिलकर गीत रचेंगे 
गीतों के स्वर से आलिंगित होकर 
रोज नए पुष्प खिलेंगे 
रमेश राय 
रविवार, मई 20,2012

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