कुछ यादें
1) यह घटना उन दिनों की है जब मै पतरातु झारखंड में रेल श्रमिक विद्यालय में पढ़ता था। मेरे पैरज़में एक बहुत बड़ा फोड़ा हो गया था जिससे चलने में भी बहुत कष्ट होता था। मै उसी अवस्था में स्कूल गया। इस पर एक शिक्षक ने कहा क्या तुम पढ़ कर राजेंद्र प्रसाद हो जाओगे। मै निरुत्तर था। (27/8/2025)
2) यह बात 1959 की रही होगी। मेरे पिता जी 1958में 56 साल उम्र के पश्चात् रेल सेवा से निवृत होने के पश्चात् एक्सटेंशन पर उनका तबादला मुरी हो गया। हमारा रेलवे क्वाटर के ठीक कुछ दूरी पर पहाड़ था। कहते हैं कि मैं अक्सर कहता था कि मुझे एक कमण्डल दो। मैं पहाड़ पर जाकर तपस्या करूंगा। फिर 1960मे पिता जी का तबादला पतरातु हो गया। वहां भी अक्सर मैं इस बात को दोहराता रहा। यह भावना मेरे अंदर दिन प्रतिदिन प्रबल हो रही थी। परिवार में आर्थिक तंगी बराबर से रही है। मुझे याद है मेरा छोटा भाई दिनेश ने कहा था यदि मै नौकरी नही करूंगा तो दिनेश और उससे छोटा भाई सुरेश की पढ़ाई कैसे होगी। गृह त्याग की भावना तो थी ही उसके साथ साथ परोपकार और मानव सेवा जैसी भावनाओं का भी समावेश हो गया था। मेरे सबसे बड़े भैया स्व: दुर्गा प्रसाद अक्सर कहते थे charity begins at home। लेकिन गृह त्याग की यह भावना तब तक मेरे अंदर घर की हुई थी जब तक 1988के कार्तिक महीने के पहले अर्घ्य के दिन गंगा से लौटते वक्त मै ट्रेन पर बैठ गया। छठ पर्व पर हम सभी पटना गए हुए थे। मै मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर उतरा। फिर मै बनारस में दो दिन तक घूरता रहा। मुझे इस बात का एहसास हुआ कि मै दो बच्चो का पिता हूं। मेरे कुछ दायित्व हैं। भगवान बुद्ध तो राजकुमार थें। कम से कम यशोधरा को राहुल के परवरिश के विषय में नहीं सोचना पड़ा होगा। मैं दो दिनों बाद पटना लौट आया। घर में आकर देखा रोआ रोई का माहौल था। किसी ने कहा था दो हीरा के समान बच्चे हैं। इसे छोड़कर कैसे चले गए। उसके बाद से गृह त्याग की भावना हमेशा के लिए चला गया। मुझे जो कुछ करना है परिवार में रह कर ही करना है।( 28/8/2025)
3) यह घटना 1980 जनवरी महीने की है। उन दिनों मै डाल्टेनगंज झारखंड में कार्यरत्त था। बहुत संभव वह तारीख 1 से 14 के बीच की होगी। कार्यालय में केवल मै और मेरे बॉस SSTE श्री भागवत प्रसाद थें। हम दोनों ने मिलकर कुछ पेपर तैयार किए। फिर उन्होंने मुझे उस कागजात को दिया और कहा कल यह कागजात Sr DSTE Dhanbad को खुद जाकर दे देना। मै रात का train पकड़ा। रात्रि 12बजे के बाद देहरी ऑन सोन पहुंचा। धनबाद की ओर जाने वाली बम्बई मेल ट्रेन आई। मैं इंजन से गार्ड तक सभी बॉगी छान मारा। किसी ने दरवाजा नहीं खोला। गाड़ी वहां मात्र दो मिनट के लिए ठहरती है। मेरे हाथ में समय नहीं था। तब मै बफर पर चढ़ गया। रात्रि के तीन बजे होंगे। जनवरी महीने के ठंड में बफर पर खड़े खड़े मेरे हाथ पैर जम गए थें। कभी भी मै गिर सकता था या फिर कोई भी RPF मुझे गोली तक मार सकता था। बीच में सिगनल न मिलने पर गाड़ी रुकी थी। मै उतरने का जोखिम नहीं उठाया। सुबह पांच बजे गाड़ी गया जंक्शन पहुंची। पैर हाथ जवाब दे दिए थे। किसी तरह रॉड पकड़ कर दरवाजे तक पहुंचा। ठीक उसी समय एक सिंगल सीट खाली हुईं। मैं उसे ग्रहण किया। बैठने के साथ नींद आ गई। आठ बजे सुबह के करीब मेरी नींद खुली। मैंने देखा यह धनबाद स्टेशन है। फिर 10बजे मै कागजात SR.DSTE को दे दिया। यदि बम्बई मेल छोड़ देता तो बहुत संभवत दोपहर 12बजे के बाद पहुंचता।
4) यह घटना अंडरटिन की है। मेरे घर के सामने एक मांस का दुकान है और आज भी है। मै मांस के दुकान के सामने खड़ा होकर एक एक बकरे को काटते हुए देखता था। और रात को सपने में वही देखता था। यह सपना आज भी यदा कदा देखता हूं।
मैं अपने जीवन का आज तक का ले तो 90% भाग शाकाहारी रहा हूं। कभी परिवार के दबाव में तो कभी दोस्तों के कहने पर। जाने में मैंने किसी जीव की हत्या नहीं किया सिवाय एक का। यह घटना 1980 की है।
मैं डाल्टेनगंज में मानव चक्रवर्ती के साथ रहता था। एक दिन मै और मानव चक्रवर्ती केचकी बाजार घूमने के उद्देश्य से गया। केचकी रेलवे स्टेशन डाल्टेनगंज से दस किलोमीटर पीछे है। वहां मानव चक्रवर्ती ने एक मुर्गी खरीदा। मुर्गी देखने में बहुत सुंदर था। मैंने अपने होशो हवाश में यही एक कत्ल किया। वरन घर में एक सांप मिला उसे भी मैने किसी तरह बाहर निकाल दिया।
5) यह बात मुझे बचपन से ही उद्वेलित करती रही है कि मैं एक बार तपस्या के लिए बैठूं और तब तक न उठूं जब तक मुझे सम्पूर्ण ज्ञान न प्राप्त हो जाए।
6) 23 अप्रैल 1985 मेरा मैरिज डे है। ठीक दो या तीन दिन बाद मैने एक कविता रची जो मेरे पत्नि को समर्पित है। इस कविता को मैं एक कागज पर लिखा था जो कहीं गुम हो गया। लेकिन उसकी कुछ पंक्तियां मुझे आज भी याद है।
ऊषाकालिन में, मधुमास में, क्षितिज की लालिमा में,
बंद पंखुड़ियों से भौंरे निकलते हैं
बयारो का स्पर्श भौंरे ही जानते होंगे ।
फिर एक और पंक्ति
प्रगाड़ के शुष्म जल में
मत्स्यों का मैथुन क्रीड़ा
यह तुम्हारी ही स्मिता है।